पीढ़ा घिसता है तो पीढ़ी बनती है

उषा दी नहीं रहीं – यह एक दारुण सत्य है लेकिन दिल है कि मानता नहीं। पिछले महीने भोपाल से लौटकर उन्होंने मैसेज किया था – ‘‘बात करने की स्थिति में नहीं हूँ पूनम – गले में बहुत दर्द है —–’’

मैंने वाट्सऐप पर ही जबाब दिया – ‘‘दीदी ! पहले आप ठीक हो जाइये, फिर करूँगी आपसे बात।’’ मुझे क्या पता था वह हमारी अंतिम लिखित बातचीत थी —-।

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के जन्मदिन समारोह (11 फरवरी 2024) के बीच अप्रत्याशित रूप से पहुँची थी वह मनहूस खबर जिसे सुनकर स्तब्ध रह गई। क्षण भर के लिए लगा जैसे मस्तिष्क चेतना शून्य हो गया हो।

आज दीदी का न होना – स्मृतियों का जीवंत दस्तावेज बन गया है। क्या-क्या याद करूँ —– ?

उषा दी के बहुआयामी व्यक्तित्व पर साक्षी भाव से लिखने के लिए मेरी शब्द संपदा आज निर्बल पड़ रही है, फिर भी मेरी अनुभूति में उनके होने का अर्थ – अपनी पूरी अर्थवत्ता में क्या है और उससे मैं किस तरह समृद्ध और प्रेरित होती रही – इसे जरूर कहना चाहूँगी।

उषा दी का लेखन विपुल है। हिन्दी और मैथिली में समानांतर लिखते हुए उन्होंने अपनी सीधी सहज अभिव्यक्ति को आलोचना के लिए एक चुनौती बनाई। प्रेमचन्द, नागार्जुन और रेणु की कथा परम्परा को विस्तार देते हुए लोक जीवन के यथार्थ को वृहत्तर आयाम दिया। मिथिला की संस्कृति, इतिहास बोध की विशिष्टता और प्रगतिशील आधुनिकता ने उनके लेखन को विशिष्ट बनाया है। कथाकार, उपन्यासकार, नाटककार, बाल साहित्यकार के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यकर्त्ता के रूप भी में वे एक अलग पहचान रखती हैं।

वैसे तो पद्मश्री उषाकिरण खान के लेखकीय व्यक्तित्व से मेरा आंशिक परिचय छात्र जीवन में ही ‘धर्मयुग’ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में 80 के दशक में यदा-कदा प्रकाशित उनकी रचनाओं को पढ़कर हो गया था, लेकिन उन्हें देखने, प्रत्यक्षतः मिलने या उनसे संवाद का कोई संयोग मुझे नहीं मिला था। पहली बार 1994 में उस बड़ी लेखिका के दो शब्द मेरे गन्तव्य का पता दे गये थे, इसे मैं कभी नहीं भूल सकती। 90 के दशक में मेरी कुछ कविताएँ और कहानियाँ छिटपुट रूप से पत्र पत्रिकाओं में छपने लगी थीं, परन्तु साहित्यिक बिरादरी से मेरा कोई सरोकार नहीं था। नितान्त घरेलू परिवेश में एक उन्मुक्त साँस लेने की तरह था मेरा लेखन – लिखकर मुक्त होती थी फिर कछुए की तरह अपनी खोल में सिमट जाती थी।

उन्हीं दिनों ‘हिन्दुस्तान दैनिक’ पटना द्वारा ‘कहानी प्रतियोगिता 1994’ का आयोजन हुआ था, जिसमें डायरी के पृष्ठों में एक वर्ष पूर्व लिखी कहानी ‘कोई तीसरा’ – मैंने यूं ही खिलंदड़ी ढंग से भेज दी और भेजकर फिर भूल भी गई। कहानी प्रतियोगिता का परिणाम 17 जनवरी 1995 को ‘हिन्दुस्तान दैनिक’ के साहित्य पृष्ठ पर निर्णायक मंडल की टिप्पणी के साथ प्रकाशित हुआ था। निर्णायक मंडल में वरिष्ठ लेखक श्री रॉबिन शॉ पुष्प, श्रीमती उषा किरण खान, और श्री ऋषिकेश सुलभ जी का नाम दर्ज था।

आयोजक के रूप में ‘हिन्दुस्तान दैनिक’ के तीक्ष्णप्रज्ञ पत्रकार नागेन्द्र की एक बड़ी सी टिप्पणी भी छपी थी – ‘‘कथा सागर से गुजरते हुए’’ जिसे पढ़कर पता चला कि निर्धारित तिथि 20 अक्टूबर 1994 तक लगभग सत्रह सौ कहानियाँ कार्यालय में पहुँची थीं और चयन की पहली प्रक्रिया से गुजर कर 51 कहानियाँ छाँट कर बिना नाम पते के निर्णायकों के पास भेजी गईं, जिसमें आठ कहानियाँ चयनित हुईं। प्रथम, द्वितीय, तृतीय और पाँच सांत्वना पुरस्कार। मैं पाँचवें नम्बर पर थी। सात महारथियों के बीच अकेली स्त्री। प्रतियोगिता की इतनी लंबी चौड़ी रपट पढ़कर और निर्णायक मंडल के मन्तव्य के साथ चयनित रचनाकारों के बीच अपनी तस्वीर देखकर जो रोमांच हुआ था, उसका स्पंदन आज तक बरकरार है। सत्रह सौ कहानियों के बीच से छनकर आना एक थ्रील पैदा कर गया था। सांत्वना पुरस्कार पाकर भी एक अकेली स्त्री कलम के रूप में निर्णायकों ने मुझे चुना था – यह मेरे लिए अप्रत्याशित खुशी थी।

नामचीन लेखिका उषाकिरण खान की टिप्पणी थी – ‘‘दैनिक हिन्दुस्तान कहानी प्रतियोगिता की इक्यावन कहानियाँ पढ़ने का मौका मिला। निर्णायक की हैसियत से ही सही समकालीन नवांगतुक की आहट अनुभूत करना आह्लादकारी लगा ——-। कुछ कथाएँ उल्लेखनीय लगीं, जिसमें ‘सॉरी नो पॉलटिक्स’, ‘घड़ी’, ‘कोई तीसरा’, ‘उपर जमीं परत’, ‘कुलदेवता’, ‘ये कहानी नहीं है’ और ‘एवमस्तु’ नामक कथाओं के रचनाकार को अच्छे कथ्य, चुस्त संवाद और बढ़िया निर्वाह के लिए बधाई देती हूँ —— मेरी शुभकामनाएँ इनके साथ हैं – ये अपने श्रम और अध्यवसाय से आगे जायेंगे।’’

यद्यपि यह निर्णायक मन्तव्य समवेत था – सबके लिए शुभकामनाएँ थीं लेकिन शुभाशंसाओं के वे शब्द मेरे लिए अमूल्य थे। अखबार का वह पृष्ठ मेरे लिए धरोहर है। मैं कभी नहीं भूल सकती कि मेरी सर्जनात्मक क्षमता का पहला प्रमाण पत्र उनके हाथों से ही मिला था – अपना एक पृथक नाम पता पा लेने जैसा।

मेरी आँखों के सामने विगत की कई स्मृतियाँ लरज रही हैं। उनसे मिलने का पहला वाकया याद आ रहा है। 2008 में हमारे महाविद्यालय में रचनात्मक लेखन की एक कार्यशाला का आयोजन होना था और हमारी प्राचार्या की इच्छा थी कि कोई नामचीन महिला लेखिका उसका उद्घाटन करें। इस आमंत्रण को लेकर मैं पहली बार उनसे मिलने उनके आवास पर गई थी। व्यक्तिगत परिचय नहीं होने के कारण मैंने मदन कश्यप जी से आग्रह किया और वो साथ हो लिये। मन में समादृत उस बड़ी लेखिका को सामने देखकर पहली बार जो ख्याल आया, वह यही था कि सौंदर्य व्यक्ति की अकूत गहराई में बसता है – रूप रंग या आभिजात्य की भव्यता में नहीं। वे सामने खड़़ी थीं – साधारण वेशभूषा और एकदम सहज स्त्री रूप में। हैंडलूम की चौड़ी बार्डर वाली साड़ी और उन्नत भाल पर उदित सूर्य सी शोभित लाल टिकुली। बड़ा सौम्य और स्नेहिल रूप था वह। खोखले दर्प और झूठे प्रदर्शन का कहीं कोई भाव नहीं। बड़े हाल में जहाँ सोफे पर हम बैठे थे – वहीं बगल की टेबुल पर किताबों और पत्रिकाओं का अंबार लगा था। लुंगी और टी शर्ट में खान साहब का सुदर्शन व्यक्तित्व सात्विकता की उष्मा से दीप्त लगा – उनकी शालीनता, गंभीरता और विद्वता की भी मैं कायल हो रही थी। मदन जी और उनके बीच देश दुनिया और राजनीति की बेशुमार बातें छिड़ गई थीं। उस वैचारिक बहस के बीच अनायास आपातकाल और नागार्जुन आ गये थे। राजनीति के गलियारे से दीदी की रसोई तक बाबा की उपस्थिति को देखती मैं मदन जी और दीदी के बीच बाबा की अन्तरंगता के कई किस्से मजे लेकर सुनती रही। पहली बार की उस मुलाकात में ही मुझे उषा दी की संश्लेषी संवेदना और विविधधर्मी सर्जना की विरासत का वोध हो गया था।

उनके स्नेहिल व्यवहार की जिस मृदुलता से बंधकर उस दिन मैं लौटी थी – बाद के दिनों में उनके व्यक्तित्व और व्यवहार में अन्तर्लिप्त उसी आत्मीयता ने उनसे मेरा एक अनौपचारिक रिश्ता बनाया।

यूँ तो दीदी के सान्निध्य का सुख मुझे पटना की लेखिकाओं की तरह बहुत नहीं मिला लेकिन जितना भी मिला, मन में तहाया हुआ लेखकीय अवदान का एक बड़ा खजाना है। कुछेक आयोजनों अथवा पटना पुस्तक मेला आदि में उनके संग साथ की सादगी और ताजगी को मैंने अनुभूति के धरातल पर कई अर्थों में महसूसा है। 2017 में मेरे तीसरे कहानी संग्रह ‘सुलगती ईंटों का धुआँ’ का लोकार्पण पटना पुस्तक मेले में उन्हीं के हाथों हुआ था। कार्यक्रम में पटना और मुजफ्फरपुर के कई वरिष्ठ और कनिष्ठ लेखक कवि कथाकार मौजूद थे। उषा दी ने अपने वक्तव्य में जो कहा था, वह टेप की हुई आवाज अब एक अमूल्य निधि के रूप में मेरा पाथेय है – ‘रेणु की परम्परा का सौभाग्य पूनम को प्राप्त है। ग्रामीण संवेदना की कथा पूनम ही लिख सकती है क्योंकि उसने बिहार के गाँवों का सच देखा और भोगा है। सामंती व्यवस्था, दास प्रथा, बटाईदारी और चकबंदी जैसे जीवन यथार्थ को उसने खुली आँखों से देखा और जाना है जबकि पूनम न तो दलित है, न वंचित वर्ग की लेकिन एक जगह खड़ी होकर समभाव से उसने जीवन को समग्रता में देखने का काम किया है। सच्ची और सुन्दर शब्दावली में जीवन यथार्थ को लिखना पूनम को आता है। उनकी कहानियों में विविधता और पात्रों में अदम्य जिजीविषा है।’’

उषा दी के संग-साथ के कुछ अविस्मरणीय पल ऐसे हैं जिसकी तासिर कभी खत्म नहीं होगी। 2019 में वे हमारे कॉलेज के राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में आई थीं। उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व का आकर्षण ऐसा था कि हिन्दी विभाग की सभी छात्राएँ उनकी फैन हो गई थीं। नई पीढ़ी के प्रति उनका मातृभाव जैसे छलक पड़ता था। नई पौध को दीक्षा देकर रचनात्मक बनाने के लिए ही उन्होंने ‘आयाम’ की भी स्थापना की थी। ‘आयाम’ में केवल लेखिका नहीं, बौद्धिक और समय सजग महिलाएँ, सामाजिक कार्यकर्त्ता और जागरुक गृहणियाँ भी हैं। एक बार बातचीत में मैंने उनसे कहा था – ‘‘दीदी आपका ‘आयाम’ साहित्यिक सांस्कृतिक एक क्लब है’’ तो उन्होंने हँसते हुए कहा था – ‘‘ठीक कहती हो ‘आयाम’ में हर विचारधारा और हर मिजाज की महिलाएँ हैं – इसकी परिधि बड़ी है। मैंने इसे वाम-दक्षिण से अलग एक रचनात्मक मंच बनाने का प्रयास किया है।’’

मैंने उस क्षण महसूस किया था, दीदी की सबसे बड़ी खूबी यही है – उनकी सांगठनिक उद्यमिता और समन्वयशीलता। विचारधारा से अलग रहकर भी प्रतिबद्ध लेखकों और संस्कृतिकर्मियों का जैसा सहज और स्पष्ट स्वीकार उनके यहाँ रहा, वह अन्यत्र दुर्लभ है। ‘आयाम’ के मंच पर पटना के सभी वरिष्ठ और कनिष्ठ लेखक, कवि, संस्कृतिकर्मी उनके मित्र और सहयोगी होकर आते रहे। खगेन्द्र ठाकुर, कर्मेन्दु शिशिर, आलोकधन्वा, अरुण कमल जैसे मार्क्सवादी लेखक चिंतक कवि भी उनके प्रशंसक रहे तो इसलिए कि उनके व्यक्तित्व में कोई फाँक नहीं था। वे विचारधारा की नहीं समन्वयवादी आस्था की रचनाकार थीं। विचारधारा के प्रति मेरा आग्रह है तो मैं कई जगहों पर उनसे असहमत भी होती थी लेकिन उनके समन्वयवादी व्यक्तित्व ने हमेशा उनके प्रति मुझे विनम्र और आस्थाशील बनाये रखा।

मैं यह मानती हूँ कि हर लेखक के संवेदन तंत्र की कुछ अपनी विशेषताएँ होती हैं। उषा दी की प्रकृति, जीवनानुभव और अभिव्यक्ति की स्वकीय विशेषता उनके परिवेश से निर्मित हुई थी। वे मिथिलांचल समाज के निम्न वर्ग की स्त्रियों के जीवन यथार्थ को रचने वाली कथाकार हैं। उनकी कहानियों में देह के प्रति वर्जना मुक्त स्त्रियों की भरमार है लेकिन वे स्त्रियाँ निम्न वर्ग से आती हैं, जहाँ देह की शुचिता कोई मायने नहीं रखती इसलिए वहाँ स्त्री विमर्श नहीं स्त्री संघर्ष है और इसे वे स्वीकार भी करती हैं कि – ‘मैं अस्सी प्रतिशत स्त्रियों की कथा लिखती हूँ। स्त्री विमर्श की कथा बीस प्रतिशत के भीतर आती है।’’

उनकी रचना प्रक्रिया पर दो वर्ष पूर्व मैंने उनसे एक लंबा साक्षात्कार लिया था जो गीताश्री के संपादन में ‘किस्सों की खान’ में प्रकाशित हुआ। उस साक्षात्कार में मैंने उनसे कुछ असुविधाजनक प्रश्न भी पूछे थे। मैंने उनसे कहा था – ‘‘दीदी ! मैथिली में लिखा आपका उपन्यास ‘भामति’ आपकी लोकप्रियता और प्रसिद्धि का मानक है। आपकी कलम ने इस कृति को अद्भुत जीवंतता दी है, परन्तु भामति के मौन समर्पण में मुझे एक स्त्री का आत्मदाह दिखा और ‘भामति’ के नाम से समर्पित पति की कृति उसके आत्मदाह के ऊपर चंदन लेप की तरह लगा – क्या मैं गलत कह रही हूँ ?’’

दीदी थोड़ा असहज हुई थीं, फिर उन्होंने कहा – ‘‘जो तुमने अनुभव किया, वही मैं वर्षों से करती आ रही थी। लेकिन ‘भामति’ की कथा का एक उजला पक्ष यह है कि वाचस्पति मिश्र पश्चाताप करते हैं। न सिर्फ इस कृति को उसके नाम करते हैं बल्कि आगे की पुस्तकों में भी अपने परिचय में ‘भामतिपति वाचस्पति’ लिखते हैं। यह प्रायश्चित असाधारण है।’’

मेरे पूछने पर दीदी ने अपनी कृतियों में ‘सिजनहार’ को सर्वश्रेष्ठ बताया था। यह उपन्यास कविश्रेष्ठ विद्यापति की जीवनी है। उन्होंने इस श्रमसाध्य कृति के लिए इतिहास का अनुसंधान किया था। विद्यापति की कई भाषाओं के विलुप्त साहित्य तथा उनपर लिखे गये साहित्य के आधार पर मैंने इसे लिखा है – ऐसा दीदी ने बताया था।

उनका उत्सवधर्मी सांस्कृतिक व्यक्तित्व अपने आप में एक आख्यान है, जो हर पाठ के साथ एक वृतांत बन सकता है। बच्चों जैसा उनका सरल सहज मन इतना पारदर्शी था कि कोई आर-पार उन्हें क्षण में देख ले। अक्सर फेसबुकिया लड़ाई को लेकर जब ‘रौरवनाद’ छिड़ जाता था तो उषादी बहुत परेशान और हकलान हो जाती थीं। मैं उन्हें तटस्थ और निरपेक्ष रहने को कहती लेकिन उनका स्नेहिल व्यक्तित्व तर्क-कुतर्क के बीच विखंडित सुरों को साध लेता था। मैं उन्हें मधुछत्ते की ‘रानी मक्खी’ कहती थी। साहित्य में उनका अभिभावकत्व विलक्षण था।

आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं तो उन्हें अश्रुपूर्ण शब्दों की श्रद्धांजलि देती हुई याद कर रही हूँ बाबा नागार्जुन की पंक्ति को – ‘‘पीढ़ा घिसता है तो पीढ़ी बनती है।’’ उनकी साहित्य साधना हमसब के लिए वही पीढ़ा है जहाँ वे अब भी बैठी हुई तर्जनी दिखाकर नई पीढ़ी को दिशा का संकेत दे रही हैं।


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