भारतीय पुलिस-तंत्र में महिलाओं की स्थिति: ‘गुनाह-बेगुनाह’ उपन्यास के विशेष सन्दर्भ में- केएम प्रतिभा

bhartiya pulish tantraभारतीय पुलिस-तंत्र में महिलाओं से सम्बंधित समस्याओं व अपराधों से निपटने के लिए महिला पुलिसकर्मियों की नियुक्ति की आवश्यकता महसूस की गयी । चूंकि महिलाओं से संबंधित अपराधों में जिस संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है, पुलिस व्यवस्था में कहीं-न-कहीं उसकी कमी थी । इसलिए महिला पुलिसकर्मियों की नियुक्ति की गयी । ताकि महिलाओं से सम्बंधित समस्याओं का निपटारा उचित तरीके से हो सके और वे अपनी समस्याएँ सहज रूप में अभिव्यक्त कर सकें । दहेज, बलात्कार, छेड़छाड़, महिलाओं और लड़कियों की अनैतिक कार्यों में लिप्तता आदि-आदि समस्याओं जैसी अतिसंवेदनशील मुकदमों की देखभाल महिला पुलिसकर्मियों के कार्यों के अंतर्गत आते हैं । इसके अलावा पॉक्सो अधिनियम (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) जैसे विशेष विधान में भी महिला पुलिसकर्मी की उपस्थिति जरूरी होती है । किन्तु महिला पुलिसकर्मियों की राह इतनी आसान नहीं है । पुलिस सेवा में जाने के निर्णय से लेकर उसमें अपना योगदान देने तक उनकी राह में अनगिनत चुनौतियाँ पेश आती हैं । हालाँकि आधुनिक सन्दर्भों में, नौकरियों की पारंपरिक ‘लिंग टाइपिंग’ द्वारा निर्धारित हदबंदियों ने अपनी दृढ़ता और कठोरता खो दी है, जिस वजह से महिलाओं को पारंपरिक रूप से मर्दाना व्यवसायों में भी अनुमति मिल रही है । किन्तु ऐसे व्यवसायों में पुरुष वर्चस्व निरंतर बना हुआ है । सामान्यतया, पुलिस-व्यवस्था पुरुष-प्रभुत्त्व वाला रहा है । जिस कारण पुलिस-व्यवस्था में महिलाओं के पुलिसकर्मी की भूमिका को उसी प्रकार पारंपरिक महिला भूमिका के विस्तार के तौर पर नहीं देखा जाता है, जिस तरह शिक्षण, नर्सिंग, चिकित्सा आदि व्यवसायों में देखा जाता है । यही एक पुलिसकर्मी के रूप में महिलाओं की लगभग समस्त समस्याओं की जड़ है ।
अधिकांशतः महिला पुलिसकर्मियों के लिए थानों में न्यूनतम बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होती हैं । जिसमें कार्यस्थल पर स्वच्छ शौचालय का अभाव, रेस्टरूम का अभाव, और क्रेच (कामकाजी स्थानों पर शिशुगृह, जहाँ स्तनपान कराने जैसी सुविधाएँ हों) की कमी, विषम कार्यघंटों के दौरान वाहन की अनुपलब्धता और आवास की सुविधा की कमी आदि प्रमुख असुविधाएँ हैं । अधिकांशतः कार्यस्थल पर साफ़-सुथरे शौचालय नहीं होते । जिसकी वजह से महिलाओं को यूटीआई और प्रजनन पथ-संबंधी बीमारियाँ तथा इसी तरह की अन्य गंभीर समस्याएँ होती हैं । थानों में महिला पुलिसकर्मियों के साथ-साथ महिला मुजरिमों के साथ किस तरह बर्ताव होता है ‘गुनाह-बेगुनाह’ उपन्यास में इन्हीं में से कुछ बुनियादी प्रश्नों और समस्याओं को मैत्रेयी पुष्पा ने उठाया है ।
मैत्रेयी पुष्पा ‘गुनाह-बेगुनाह’ (2011) उपन्यास के माध्यम से पुलिस व्यवस्था के दहशतनाक और विद्रूपतम चेहरे को महिला पुलिसकर्मियों की नज़र से देखने की कोशिश की है । इसके साथ ही, थानों में मुजरिम अथवा पीड़िता के साथ किस तरह का बर्ताव किया जाता है, उसकी भी चीर-फाड़ करती हैं । यह कहानी सालारपुर थाने में तैनात महिला पुलिसकर्मी इला चौधरी की है । कांस्टेबल इला चौधरी पुलिस- तंत्र के साथ-साथ अपने जीवन की कई कठिनाइयों से गुजरते हुए भारतीय पुलिस-तंत्र के क्रूर, हिंसालोलुप और स्त्रीभक्षक रूप को उजागर करती है । इस उपन्यास में “इला जो अपने स्त्री वजूद को अर्थ देने और समाज के लिए कुछ कर गुजरने का हौसला लेकर खाकी वर्दी पहनती है, वहाँ जाकर देखती है कि वह चालाक, कुटिल लेकिन डरपोक मर्दों की दुनिया से निकलकर कुछ ऐसे मर्दों की दुनिया में आ गई है जो और भी ज्यादा क्रूर, हिंसालोलुप और स्त्रीभक्षक हैं । ऐसे मर्द जिनके पास वर्दी और बेल्ट की ताकत भी है, अपनी अधपढ़ मर्दाना कुंठाओं को अंजाम देने की निरंकुश निर्लज्जता भी और सरकारी तंत्र की अबूझता से भयभीत समाज की नजरों से दूर, थाने की अँधेरी कोठरियों में मिलनेवाले रोज-रोज के मौके भी ।

1. पुलिस की नौकरी निचले स्तर पर यानी सिपाही के स्तर पर महिलाओं के लिए भयावह, दुष्कर और चुनौतीपूर्ण है । पारिवारिक शोषण और दमन से छुटकारा पाने और अपने अस्तित्व को बचाए रखने की आकांक्षा से आजीविका की तलाश में थोड़ा बहुत पढ़-लिखकर पुलिस में भर्ती होने का साहस दिखाने वाली स्त्रियों का जीवन निरंतर संघर्षों में गुजरता है । उपन्यास के आरम्भ में ही इला चौधरी एक बेचैनी और कश्मकश से गुजरती है । “सालारपुर थाना । इस थाने पर कांस्टेबल की तरह ड्यूटी है इला चौधरी की । इसी कस्बे में एक टूटा-फूटा कमरा रिहाइश के रूप में इंतज़ार करता है उसका । घबराहट भरे लमहे और कमरे में सनसनाती वीरानी । सूनेपन में किसको बताए कि उसकी ज़िन्दगी पर मज़बूरी का कैसा जखीरा उतरा है ! सहकर्मी हों या अफसर, साथ देनेवाले नहीं, कंधे उचकाकर जता रहे हैं कि इला कसूरवार है और कोई भी कसूरवार अपने किए को सही सिद्ध करता रहता है ।

2. इतना ही नहीं, वह मन-ही-मन एक प्रण करती है– “बता देना चाहिए कि मैं किस मकसद से पुलिस में आई हूँ । मुझे गलत मान रहे हो तो मैं गलत रहकर ही दिखाऊँगी क्योंकि पुलिस नियमावली में फेर-बदल की सख्त जरूरत है ।

3. लेखिका उपन्यास के आरम्भ में ही पुलिस नियमावली में फेरबदल की आवश्यकता महसूस करती हैं । क्योंकि इस नियमावली के भीतर महिलाएँ उस स्थान पर भी सुरक्षित नहीं हैं जिस स्थान पर उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की गई है ।
भारतीय पुलिस-व्यवस्था में अपेक्षाकृत महिला पुलिसकर्मियों की संख्या बहुत कम है । अधिकांश थानों में एक या दो ही महिला पुलिसकर्मियों की नियुक्ति होती है । ऐसे में, जब महिला पुलिसकर्मी के साथ किसी तरह की घटना घटती है, ऐसी परिस्थिति में, उसके सहारे के लिए कोई अन्य महिला उपस्थित नहीं होती है । ‘गुनाह-बेगुनाह’ उपन्यास में इला चौधरी, जो सालारपुर थाने में कॉन्स्टेबल की ड्यूटी पर है, एक हट्टी-कट्टी महिला मुजरिम से डरती है–“अगर ये अपनी हट्टा-कट्टी देह को ताकत लगाकर खड़ी कर ले और इला पर पिल पड़े तो स्थिति कैसी होगी ? कम से कम दो महिला सिपाहियों की ड्यूटी होनी चाहिए । लाठी-डंडा अगर सिपाही चला सकती है तो तथाकथित वेश्या क्या पिटती रहेगी, आखिर इसने भी जीने के लिए जी भरकर संघर्ष करने का अभ्यास किया है ।…और यह बात तो हर थाने पर खासतौर पर मिलेगी कि महिला सिपाही अगर सहायता के लिए चिल्लाए तो कौन आएगा मदद के लिए ? हवलदार से एस.आई. तक सब छककर पीते हैं लुढ़के रहते हैं ।

4. वह इसलिए नहीं डरती है कि महिला कैदी उसको नुकसान पहुँचाएगी और उसके पास उससे निपटने का कोई तरीका नहीं हैं, बल्कि वह इसलिए डरती है क्योंकि महिला सिपाही के तौर पर थाने में वह अकेली है और पुरुष-प्रभुत्त्व वाले इस स्थान पर उसकी पहचान एक सिपाही से पहले एक महिला के रूप में है । वह किसी अप्रत्याशित घटना से भयभीत रहती है । अपराधी तो अपराधी, कई बार महिला सिपाहियों के साथ उनके पुरुष सहकर्मी भी दुर्व्यवहार करते हैं । उनके साथ मानसिक और दैहिक शोषण की घटनाएँ अक्सर होती रहती हैं । यह अलग बात है कि वह संज्ञान में नहीं आ पातीं । क्योंकि नैतिकता, शर्म और भय– उन पर अपनी अस्मिता से कहीं अधिक हावी हो जाती है ।
चूँकि ‘गुनाह-बेगुनाह’ उपन्यास महिला पुलिसकर्मियों से संबंधित है । अतः मैत्रेयी पुष्पा ने इस उपन्यास में नए दौर की जागरूक, संघर्ष करने वाली विभिन्न स्त्री-चरित्रों को केस हिस्ट्री के रूप में प्रस्तुत किया है । जिसमें देह श्रमिक रश्मि, पति की हत्या के आरोप में गिरफ़्तार कर लायी गई शीतल, बैंक में नौकरी करनेवाली अर्चना, अपने पुत्र की हत्या के जुर्म में पकड़कर लायी गई शारदा आदि न जाने कितनी ही स्त्रियों की बानगी प्रस्तुत करता है यह उपन्यास । उक्त सभी केसों में महिलाओं द्वारा अपने सगे-सम्बन्धियों की गई हत्याएँ किसी-न-किसी बड़ी मजबूरी के कारण हुई हैं । किन्तु थानों में उनके साथ निर्ममतम् व्यवहार किया जाता है । उनके साथ बदतमीजी, छेड़छाड़, बलात्कार किया जाता है । थानों में महिला मुजरिमों के साथ गाली-गलौज़ आम समस्या है । मैत्रेयी पुष्पा थानों में पुलिस द्वारा स्त्रियों के लिए प्रयोग किए जाने वाले अपशब्दों का विरोध करती हैं । इला के माध्यम से वह कहती हैं –  ‘औरत को गिरफ्तार करना है’ क्या यह काफी नहीं है, मर्दानी पुलिस के लिए ? नहीं है काफी क्योंकि यह जो अपमानमूलक शब्द तोहफे में मिला है, उसे औरत को भूलने नहीं दिया जाता । और मर्दानगी निरंतर अपनी ताकत दिखाती रहती है ।

5. थाने में स्त्रियों के साथ गाली-गलौच और अपशब्दों का प्रयोग अपने क्रूरतम स्तर पर आम बात है । देह श्रमिक महिलाओं के साथ सदैव अपशब्दों का प्रयोग किया जाता है। थानों में महिला फरियादियों के साथ पुलिसकर्मी अक्सर बदतमीजी करते हैं । ममता, जो अपने पति की रिहाई के लिए गुहार लगाती थाने में आती है । उसके साथ थाने के पुलिसकर्मी सामूहिक बलात्कार करते हैं– “हाँ, उसके साथ थाने के लोगों ने गैंग रेप किया । सामूहिक बलात्कार । पति की रिहाई का हर्जाना ।

6. कुछेक केस में थर्ड डिग्री का भी प्रयोग किया जाता है । और ये व्यवहार महिला पुलिसकर्मियों के सामने उनके उच्च अधिकारियों अथवा समकक्ष पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा किए जाते हैं । एक महिला होने के नाते पुलिसकर्मियों के सामने महिला मुजरिमों अथवा अपने साथ हुए अन्याय की रिपोर्ट लिखवाने आयीं स्त्रियों के साथ इस तरह का व्यवहार होते देखना उन्हें असहायता की चरम तक ले जाता है । इतना ही नहीं, थाने में इला, समीना, प्रिया, मनीषा, सुरेंदर कौर जैसी महिला पुलिसकर्मियों के साथ भी उच्च अधिकारी अथवा समकक्ष पुलिसकर्मी बदतमीजी करते हैं । किन्तु महिलाओं के साथ थानों में होने वाली इस बर्बरता का कोई लिखित इतिहास नहीं है । इला कहती है – “यह बात तो है कि विभाग में न आते तो कई राज-रहस्यों की गाँठ न खुलती । असलियतों से समाज कितना नावाकिफ है ! वह इसलिए कि हमें ढर्रों पर विश्वास करते रहने की आदत है । दहेज़ विरोधी क़ानून का राज, घरेलू हिंसा का रहस्य, सामूहिक बलात्कारों की असलियतें, यहाँ तक कि औरतों द्वारा अंजाम दिए गए हत्याकांडों के कच्चे चिट्ठे । हमारे इतिहास में कहाँ मिलेंगे ? इतिहास बड़ी फुरसत में, सोच-समझकर लिखा गया है । वंश और महान घटनाओं की सूचनाओं के साथ उसका महिमामंडन…

7. पुलिस विभाग में महिला पुलिसकर्मियों के लिए पदोन्नति बहुत बड़ी चुनौती है । “पुलिस विभाग में पदोन्नति के बारे में अनेक समस्याएँ ऐसी हैं जो पुलिस में महिलाओं को बुरी तरह प्रभावित करते हैं । सबसे पहले विभाग के भीतर पदोन्नतियाँ समस्याओं के दलदल में फंसी हुई हैं ।…मूल्याङ्कन प्रणाली और पदोन्नति में विषय निष्पक्षता और समानता के अभाव की चिंता की आवाज काफी पहले वर्ष 1981 में ही राष्ट्रीय पुलिस आयोग द्वारा उठा दी गयी थी जिसमें अभिलेख प्रबंधन के रख रखाव की कमियों और मूल्यांकन प्रपत्रों को भरने में पूर्वाग्रह और पक्षपात की गुंजाइश को उजागर किया गया था ।…महिला पुलिस के लिए तो समस्या आगे और चौगुणी बढ़ जाती है क्योंकि अधीनस्थ पदों पर महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग कैडर सिस्टम है । महिला पुलिस के लिए हवलदार, उप निरीक्षक और निरीक्षकों के केवल कुछेक चुनिंदा पद आवंटित किए जाते हैं । परिणामस्वरूप पदोन्नति के अवसर काफी कम हो जाते हैं । एक पुरुष सिपाही अपने कैरियर के दौरान उप निरीक्षक तक के पद तक पहुँच सकता है किन्तु हवलदार और उप निरीक्षक के कुछ ही पद महिलाओं को देने से बहुत कम महिला सिपाही पदोन्नत हो सकती हैं ।

8. इस तरह, जिस क्षेत्र में निचले स्तर पर ही महिलाओं की भागीदारी और उनके अनुकूल वातावरण तथा सुरक्षा की कमी दिखाई पड़ती है, वहाँ उच्च पदों तक उनकी पहुँच की क्या स्थिति होगी इसका अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं लगता है अक्सर पुलिस विभाग में महिला पुलिसकर्मियों को उसी परिस्थिति में सम्मान मिलता है जब वे उच्च पदाधिकारी हों अन्यथा उन्हें पदनुरूप बुनियादी सम्मान भी नहीं मिल पाता है । किन्तु कईयों बार पुलिस अधिकारी के रूप में भी महिलाएँ पुरुष वरिष्ठों पर निर्भरता के कारण समय पर स्वतंत्र निर्णय लेने में असमर्थ होती हैं । कई बार महिला पुलिसकर्मियों द्वारा पुरुष पुलिसकर्मियों के बराबर सराहनीय कार्य करने के बावजूद भी उन्हें उसका श्रेय नहीं मिलता है ; बल्कि उनके कार्यों का सारा श्रेय पुरुष सहकर्मी को दे दिया जाता है । जो महिला पुलिसकर्मियों के लिए अत्यंत अपमानजनक है । बहुत बार ऐसा भी होता है कि किसी मामले में महिला पुलिसकर्मियों की राय को तवज्जो ही नहीं दी जाती है । उनके पुरुष सहकर्मी अपने अनुरूप ही सारी प्रक्रिया को पूर्ण कर लेते हैं । ‘गुनाह-बेगुनाह’ में थाने में महिला पुलिसकर्मी इला की तैनाती के बावजूद भी उसके सहकर्मी बिना उसे बताए महिला मुजरिम की गिरफ़्तारी करते हैं । “इला जबर्दस्त आवेश में आगे बढ़ी । गुस्से से तिलमिला उठी । ‘मेरे बिना ही…लेडी कांस्टेबल के बिना ही इस औरत की गिरफ़्तारी…ड्यूटी के नाम पर इन निर्लज्ज पुलिसवालों ने मुझे छला है । मेरी भावनाओं को कुचला है, मेरे संकल्प को मटियामेट कर डाला’ ।

9. इला निरंतर पुलिस-व्यवस्था की स्त्रियों के प्रति बर्बरता के खिलाफ संघर्ष करती है । किन्तु कथा के चरमोत्कर्ष पर इला का तबादला कर दिया जाता है, वह भी मेवात की रेतीली और करील की झाड़ियों से घिरे जुझारगढ़ थाने में कर दिया जाता है । इस तरह पुरूष सत्ता और समाज अपनी मूल प्रकृति में सशक्त, ईमानदार तथा स्वावलंबी स्त्री को किस तरह रौंद डालता है इसका चित्रण भी मैत्रेयी पुष्पा ने बखूबी किया है । मैत्रेयी पुष्पा स्त्रियों के असुरक्षित अस्तित्व को लेकर अपने सम्पूर्ण लेखन में बेहद बेचैन और चिंतित रहीं हैं । अपनी इसी बेचैनी और स्त्रियों के उत्पीड़न की परतों को खोलने की उनकी उत्कंठा ही उन्हें इला जैसी सिपाही के मध्य खींच लाती है ।
पुलिस विभाग में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अपर्याप्त रहा है । इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उन्हें ‘वुमन फ्रेंडली’ माहौल का न मिल पाना है । जिसकी वजह से अक्सर वे तमाम तरह की समस्याओं से जूझती हैं । ऐसे में, सरकारी तंत्र की जिम्मेदारी है कि वह महिला पुलिसकर्मियों की प्रकृति और क्षमता के अनुरूप उसके लिए एक उचित प्रणाली अपनाए । ताकि महिला पुलिसकर्मी भी अपनी उत्पादक क्षमताओं की ऊर्जा को बनाए रखने में सफल हों और इस व्यवस्था में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकें । साथ ही, महिला आवश्यकतानुरूप उनकी भर्तियाँ हों और महिलाएँ पुलिस की नौकरी को स्वयं के लिए उपयुक्त समझ पाएं । अक्सर पुलिस संगठन में पुरुष पुलिसकर्मी द्वारा महिला पुलिसकर्मी की भूमिका की पहचान और स्वीकार्यता के प्रति नकारात्मक रवैय्या देखने को मिलता है । इसका कारण है कि परंपरागत तौर पर कानून प्रवर्तन व्यवसायों पर पुरुष वर्चस्व रहा है । इस वजह से, बहुत बार महिला पुलिसकर्मियों के साथ पुरुष सहकर्मी तथाकथित पुरुषवादी रवैया अख्तियार करते हैं ।

सन्दर्भ सूची :
1. मैत्रेयी पुष्पा, गुनाह-बेगुनाह, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2014, कवर पेज.
2. वही, पृ. सं. 7.
3. वही, पृ. सं. 7.
4. वही, पृ. सं. 22.
5. वही, पृ. सं. 8.
6. वही, पृ. सं. 55.
7. वही, पृ. सं. 121.
8. https://crpf.gov.in/hi/Welfare/National-Conference-of-Women-in-Police
9. मैत्रेयी पुष्पा, गुनाह-बेगुनाह, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, पृ. सं. 15.

केएम प्रतिभा
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली- 110067.
मेल आईडी- pratibhajnu7@gmail.com

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